श्रीविष्णुपुराण पंचम अंश अध्याय 37 | यादव वंश का विनाश और श्रीकृष्ण का स्वधाम गमन
॥ श्रीविष्णुपुराण ॥
ऋषि-शाप, यादव-विनाश और भगवान श्रीकृष्ण का स्वधाम-गमन
पंचम अंश • अध्याय 37
भगवान श्रीकृष्ण की अंतिम लीला और पृथ्वी-भार-हरण की पूर्णता
श्रीविष्णुपुराण के पंचम अंश के सैंतीसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण की अंतिम लीलाओं का वर्णन मिलता है। इसमें ऋषियों के शाप से यादव कुल के विनाश, बलराम जी के दिव्य प्रस्थान, भगवान श्रीकृष्ण के योगमय स्वधाम-गमन और पृथ्वी पर उनके अवतार-कार्य की पूर्णता का प्रसंग वर्णित है।
यह कथा केवल एक महान वंश के अंत की कथा नहीं है, बल्कि भगवान की दिव्य इच्छा, काल के विधान और अवतार के उद्देश्य को समझाने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग है।
पृथ्वी का भार उतारने का कार्य पूर्ण होने की ओर
पराशर मुनि कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने बलदेव जी की सहायता से दैत्यों, दुष्ट राजाओं और पृथ्वी पर बढ़े हुए अधर्म का विनाश किया। महाभारत के महान युद्ध सहित असंख्य सेनाओं के नाश से पृथ्वी का भारी बोझ उतर चुका था।
फिर भी भगवान जानते थे कि यादवों का महान बल और गर्व शेष है। पृथ्वी-भार-हरण का कार्य तब तक पूर्ण नहीं हो सकता था, जब तक उस शक्ति का भी उपसंहार न हो जाए।
भगवान की दृष्टि में यह कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं थी। पराशर स्पष्ट संकेत करते हैं कि श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने कुल के अंत के लिए ऋषियों के शाप को निमित्त बनाया।
मैत्रेय ने इसी विषय में प्रश्न किया कि भगवान ने किस प्रकार ब्राह्मण-शाप को कारण बनाकर अपने वंश का संहार किया और मनुष्यरूप का परित्याग कैसे किया।
पिण्डारक में यादव कुमारों की अविवेकपूर्ण लीला
एक समय विश्वामित्र, कण्व और देवर्षि नारद सहित अनेक महर्षि पिण्डारक नामक पवित्र तीर्थ में उपस्थित थे। यादवों के कुछ कुमारों ने विनोद और अहंकार से प्रेरित होकर उन सर्वज्ञ ऋषियों की परीक्षा लेने का निश्चय किया।
उन्होंने साम्ब को स्त्री-वेष में सजाया और उसके पेट को ऐसा बनाया, मानो वह गर्भवती हो। फिर वे साम्ब को ऋषियों के सामने ले गए और उपहासपूर्वक पूछने लगे—
दिव्य ज्ञान से युक्त ऋषि समझ गए कि उनके साथ छल किया जा रहा है। अपमान से क्रुद्ध होकर उन्होंने कहा—
युवकों का विनोद उसी क्षण भय में बदल गया। वे द्वारका लौटे और जो कुछ हुआ था, वैसा ही राजा उग्रसेन को बताया। शीघ्र ही साम्ब के उदर से वास्तव में लोहे का मुसल उत्पन्न हुआ।
मुसल को पीसना और एरक घास की उत्पत्ति
उग्रसेन ने उस अशुभ मुसल को देखकर उसे पूर्णतः चूर्ण कराने का आदेश दिया। लोहे का वह मुसल पीसकर बारीक चूर्ण किया गया और समुद्र में फेंक दिया गया, ताकि शाप का प्रभाव समाप्त हो जाए।
किन्तु विधि का विधान कुछ और था। समुद्र-तट पर उसी चूर्ण से तीक्ष्ण एरक घास उत्पन्न हुई। आगे चलकर वही साधारण दिखने वाली घास वज्र के समान कठोर होकर यादवों के विनाश का साधन बनी।
शाप को निष्फल करने का बाहरी प्रयत्न किया गया, किन्तु भगवान स्वयं इस नियत उपसंहार को रोकना नहीं चाहते थे। श्रीकृष्ण सब जानते हुए भी उस क्रम को होने देते हैं, क्योंकि अवतार का कार्य अब अंतिम चरण में था।
देवताओं का संदेश और वायु का आगमन
उधर देवताओं ने विचार किया कि भगवान का पृथ्वी पर अवतरण जिस कार्य के लिए हुआ था, वह लगभग पूर्ण हो चुका है। उन्होंने वायु को दूत बनाकर श्रीकृष्ण के पास भेजा।
वायु ने प्रणाम कर निवेदन किया कि देवगण स्मरण करा रहे हैं—भगवान को पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए सौ वर्ष से अधिक समय बीत चुका है। यदि उन्हें उचित लगे तो अब देवलोक की ओर लौटें।
श्रीकृष्ण ने शांत भाव से उत्तर दिया कि वे यह सब पहले से जानते हैं। उन्होंने कहा कि यादवों का बल अभी पृथ्वी पर शेष है, अतः पृथ्वी का भार पूर्णतः नहीं उतरा है।
उन्होंने संकेत दिया कि सात रात्रियों के भीतर वे उस शेष कार्य को भी पूर्ण करेंगे। द्वारका के लिए समुद्र से जो भूमि ली गई थी, वह भी समुद्र को वापस कर दी जाएगी।
भगवान ने वायु से कहा कि यादवों का उपसंहार करके वे बलदेव सहित इस मानुष-देह का परित्याग करेंगे और देवताओं के समीप अपने दिव्य स्थान को प्राप्त होंगे। वायु यह संदेश लेकर देवताओं के पास लौट गए।
द्वारका में अपशकुन और प्रभास जाने की आज्ञा
इसके बाद द्वारका में अत्यन्त भयंकर उत्पात और अपशकुन दिखाई देने लगे। ग्रहों की विचित्र स्थिति, आकाशीय विकार, उल्काएँ और चर-अचर में अशुभ परिवर्तन आने लगे।
श्रीकृष्ण ने यादवों से कहा—
यही वह क्षण था जब महाभागवत उद्धव ने समझ लिया कि कुल-समाप्ति का समय आ गया है। उन्होंने भगवान को प्रणाम कर पूछा—
उद्धव को बदरिकाश्रम भेजना
श्रीकृष्ण ने उद्धव को इस विनाश से दूर भेजने का निश्चय किया। उन्होंने उसे गन्धमादन क्षेत्र में स्थित पवित्र बदरिकाश्रम, नर-नारायण के स्थान में जाने का निर्देश दिया।
भगवान ने उद्धव से कहा कि वहाँ भगवान का चिन्तन करते हुए निवास करें और उनकी कृपा से परम सिद्धि प्राप्त करें।
श्रीकृष्ण ने उद्धव को यह भी बताया कि यादव कुल का उपसंहार करके वे स्वयं पृथ्वी से प्रस्थान करेंगे। द्वारका छोड़ने पर समुद्र नगर को जलमग्न कर देगा, किन्तु उनका अपना भवन अवशिष्ट रहेगा, क्योंकि वहाँ वे भक्तों के हित के लिए सदा विशेष रूप से सन्निहित रहेंगे।
उद्धव ने भगवान को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा पाकर नर-नारायण के तपोवन की ओर प्रस्थान किया।
प्रभास में यादवों का मद्यपान और कलह
इसके बाद समस्त यादव—कुकुर, अन्धक और वृष्णि कुल के लोग—श्रीकृष्ण, बलराम और अन्य प्रमुख जनों के साथ रथों पर चढ़कर प्रभास पहुँचे।
वहाँ उन्होंने अत्यधिक मद्यपान किया। विवेक क्षीण हुआ और परस्पर वाद-विवाद आरम्भ हो गया।
छोटी-छोटी बातों पर गर्वपूर्ण विवाद बढ़ते गए। कौन श्रेष्ठ है, किसका भोजन उत्तम है और किसकी कीर्ति अधिक है—इन बातों को लेकर कटु वचन बोले जाने लगे।
कटु वचन ने क्रोध को जन्म दिया और क्रोध ने मारक संघर्ष का रूप ले लिया। पहले शस्त्र चले, फिर हाथ लगे जो कुछ मिला, उसी से एक-दूसरे पर प्रहार होने लगा।
एरक घास का वज्र बन जाना
जब उपलब्ध शस्त्र टूटने लगे तो यादवों ने भूमि से एरक घास उखाड़ी। वही घास मुसल के चूर्ण से उत्पन्न हुई थी।
हाथ में लेते ही वह वज्र के समान कठोर और प्राणघातक बन गई। जिस मुसल को समुद्र में फेंककर निष्फल समझा गया था, उसकी शक्ति अब प्रत्येक तृण में प्रकट हो उठी।
यादव उन्हीं एरक तृणों से एक-दूसरे का वध करने लगे। श्रीकृष्ण ने उन्हें रोकने का प्रयत्न किया, किन्तु मत्त लोग उनके वचनों को भी नहीं मानते थे।
किसी को लगा कि कृष्ण विरोधी पक्ष की सहायता कर रहे हैं, इसलिए कलह और बढ़ गया। दैववश भाई ने भाई को, मित्र ने मित्र को मारना आरम्भ कर दिया।
अन्ततः श्रीकृष्ण ने भी वही एरक तृण हाथ में लिया और जो विनाशकारी संघर्ष में आततायी हो चुके थे, उनका संहार किया। कुछ ही समय में विशाल यादव समुदाय का लगभग पूर्ण अंत हो गया। केवल श्रीकृष्ण और सारथी दारुक शेष रह गए।
बलराम का दिव्य प्रस्थान
श्रीकृष्ण और दारुक वहाँ से चलते हुए बलराम जी के पास पहुँचे। बलराम जी एक वृक्ष के नीचे आसन लगाकर योग में स्थित थे।
उसी समय उनके मुख से एक विशाल दिव्य नाग प्रकट हुआ। वह उनके मूल स्वरूप अनन्त शेष की अभिव्यक्ति था।
वह महान सर्प सिद्धों और नागों द्वारा पूजित होता हुआ समुद्र की ओर चला। समुद्रदेव स्वयं अर्घ्य लेकर उसका स्वागत करने आए और श्रेष्ठ नागों ने उसकी पूजा की।
इस प्रकार बलदेव जी का मानुष-अवतार समाप्त हुआ और उनका अनन्त-स्वरूप समुद्र में प्रविष्ट हुआ।
दारुक को अंतिम संदेश
बलराम जी के प्रस्थान को देखकर श्रीकृष्ण ने दारुक से कहा कि वह द्वारका जाए और वसुदेव तथा उग्रसेन को यादवों के विनाश और बलराम जी के अवतार-संवरण का समाचार दे।
साथ ही सबको बता दे कि श्रीकृष्ण भी योग में स्थित होकर अपने मानुष शरीर का परित्याग करेंगे।
उन्होंने द्वारकावासियों को चेतावनी देने को कहा कि समुद्र शीघ्र ही पूरी नगरी को डुबो देगा। सब लोग अर्जुन के आगमन की प्रतीक्षा करें और उसके आने के बाद द्वारका में न रहें।
दारुक को यह भी आज्ञा मिली कि वह अर्जुन से कहे—
श्रीकृष्ण ने वज्र को भविष्य में यादवों का राजा बनाए जाने का संकेत भी दिया।
दारुक ने बार-बार भगवान को प्रणाम और प्रदक्षिणा की, फिर उनकी आज्ञा का पालन करने चला गया।
भगवान का योग और जरा का आगमन
दारुक के चले जाने पर भगवान गोविन्द ने अपने चित्त को परम वासुदेवस्वरूप में स्थिर किया। वे योग में स्थित होकर संसार की दृष्टि में मानुष-अवतार के अंतिम क्षण की प्रतीक्षा करने लगे।
वे ऐसे बैठे कि एक पैर दूसरे घुटने के ऊपर था और चरण का भाग दूर से मृग के मुख या शरीर के समान दिखाई देता था।
उसी समय जरा नाम का एक व्याध वहाँ आया। उसके बाण की नोक उसी बचे हुए लोहे के अंश से बनी थी, जो मुसल का अवशेष था।
उसने दूर से भगवान के चरण को मृग समझकर बाण चला दिया। बाण चरण में लगा और जरा निकट आया।
जरा की प्रार्थना और भगवान की करुणा
निकट आकर जरा ने चार भुजाओं से युक्त दिव्य पुरुष को देखा। वह भय और पश्चात्ताप से भर गया। भूमि पर गिरकर बार-बार क्षमा माँगने लगा—
भगवान ने उससे कहा—
उन्होंने अपने प्रसाद से उसे स्वर्गलोक जाने का वर दिया। उसी क्षण दिव्य विमान आया और जरा भगवान की कृपा से उसमें बैठकर स्वर्ग चला गया।
इस प्रसंग में व्याध भगवान के अंत का वास्तविक कारण नहीं, केवल निमित्त है। स्वयं भगवान योग में स्थित होकर अपने अवतार-कार्य का समापन कर रहे थे।
मानुष देह का परित्याग और परम स्वरूप में स्थिति
जरा के चले जाने पर श्रीकृष्ण ने अपने आत्मस्वरूप को अविनाशी, अचिन्त्य, निर्मल, ब्रह्ममय वासुदेवस्वरूप में स्थित किया।
जो अजन्मा, अमर, अप्रमेय और अखिलात्मा विष्णु हैं, उसी अपने स्वरूप में स्थित होकर उन्होंने लोक-दृष्टि के लिए ग्रहण किया हुआ मानुष शरीर त्याग दिया।
इस प्रकार वे सामान्य जीव की भाँति मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए। अवतार के निमित्त धारण किया गया मानुष रूप समाप्त हुआ और वे अपने सनातन विष्णुमय धाम में स्थित हुए।
पृथ्वी-भार-हरण, दुष्टों का विनाश, धर्म की स्थापना और यादव-शक्ति का उपसंहार—अवतार का समस्त प्रयोजन पूर्ण हो चुका था।
इस कथा से मिलने वाला आध्यात्मिक संदेश
श्रीविष्णुपुराण का यह प्रसंग हमें समझाता है कि भगवान की लीलाएँ सामान्य मानवीय घटनाओं से परे हैं। उनका अवतरण धर्म की स्थापना और पृथ्वी के भार को दूर करने के लिए होता है।
यादव कुल का विनाश यह दर्शाता है कि महान शक्ति और वैभव के साथ यदि अहंकार, अविवेक और मर्यादा का उल्लंघन जुड़ जाए, तो उसका परिणाम विनाशकारी हो सकता है।
भगवान श्रीकृष्ण का स्वधाम-गमन सामान्य मृत्यु नहीं, बल्कि उनके दिव्य अवतार-कार्य की पूर्णता है। वे अजन्मा, अविनाशी और सनातन परमात्मा हैं।
इस कथा का सार यही है कि संसार में सब कुछ काल और ईश्वर की व्यवस्था के अधीन है। भगवान के प्रति श्रद्धा, विनम्रता, विवेक और धर्म का पालन ही मनुष्य के जीवन को सार्थक बनाता है।
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